Yuvraj Sarda

नज़रों के सामने रहते हुए भी

अनसुनी रह गई इस कमरे की आवाज़

शायद लोग जानते नहीं

या जानने वालों में दिलचस्पी नहीं

या फिर बंद अलमारियों को देख

कभी कुछ किया नहीं |

कभी इन्हें खोला होता

तो आज ‘यूरेका’ चिल्ला रहे होते;

आखिर छोटे-छोटे टुकड़े जोड़कर,

घंटों तक सोचकर

होता है आविष्कार |

इन टुकड़ों की दुनिया कुछ ऐसी ही है

एक बार घुस गए तो विचारों की बौछार

कुछ बनाए बिना आपको जाने नहीं देती

नए आविष्कारों के जड़ यहीं से उगते हैं

लेकिन फिर भी अनसुनी रह गई है

इस कमरे की आवाज़ |

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