नज़रों के सामने रहते हुए भी

अनसुनी रह गई इस कमरे की आवाज़

शायद लोग जानते नहीं

या जानने वालों में दिलचस्पी नहीं

या फिर बंद अलमारियों को देख

कभी कुछ किया नहीं |

कभी इन्हें खोला होता

तो आज ‘यूरेका’ चिल्ला रहे होते;

आखिर छोटे-छोटे टुकड़े जोड़कर,

घंटों तक सोचकर

होता है आविष्कार |

इन टुकड़ों की दुनिया कुछ ऐसी ही है

एक बार घुस गए तो विचारों की बौछार

कुछ बनाए बिना आपको जाने नहीं देती

नए आविष्कारों के जड़ यहीं से उगते हैं

लेकिन फिर भी अनसुनी रह गई है

इस कमरे की आवाज़ |

--

--